मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

अधूरा पज़ल


क्‍या सोच रही हो ?
कुछ नहीं बस यूं ही
यह सुनकर
बेफिक्री  से आगे बढ जाता है वह 
जान नहीं पाता कि 
इस कुछ नहीं के भीतर
छिपा है बहुत कुछ 
जो रह जाता है अकसर 
अनदेखा-अनसुना 
अधूरा-सा 
उस बच्‍चे की पज़ल की तरह 
जिसका कोई एक ब्‍लॉक 
हमेशा गुम जाता है कहीं 
...और बनते-बनते रह जाता है अधूरा 
 तालियां बजाती लडकी का एक हाथ 
नीम के डाल पर बैठी 
 गौरैया का एक पंख 
और गमले में खिला गुलाब .... 
यह सब देखकर पल भर को मायूस 
हो जाता है वह।  
फिर  समेटता है बिखरे ब्‍लॉक्‍स  
और बार -बार रचता है कुछ नया 
सिर्फ इसी उम्‍मीद में कि
शायद अगली बार
उसकी कोशिश मुकम्‍मल होगी।

3 टिप्‍पणियां: