मेरी जमीं मेरा आसमां
मन के दरवाजे पर शब्दों की दस्तक...
सोमवार, 20 अप्रैल 2015
सपने
रेशमी अहसासों के बारीक धागो से
सपनों की ओढनी बुनती लडकी
डरती है कि
कहीं चटक कर टूट न जाए कोई धागा
फिर भी वह बुनना नहीं छोडती
क्योंकि ...
समय के साथ
सयानी होती लडकी
समझने लगी है
अपने सपनों की कीमत।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें