मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

अधूरा पज़ल


क्‍या सोच रही हो ?
कुछ नहीं बस यूं ही
यह सुनकर
बेफिक्री  से आगे बढ जाता है वह 
जान नहीं पाता कि 
इस कुछ नहीं के भीतर
छिपा है बहुत कुछ 
जो रह जाता है अकसर 
अनदेखा-अनसुना 
अधूरा-सा 
उस बच्‍चे की पज़ल की तरह 
जिसका कोई एक ब्‍लॉक 
हमेशा गुम जाता है कहीं 
...और बनते-बनते रह जाता है अधूरा 
 तालियां बजाती लडकी का एक हाथ 
नीम के डाल पर बैठी 
 गौरैया का एक पंख 
और गमले में खिला गुलाब .... 
यह सब देखकर पल भर को मायूस 
हो जाता है वह।  
फिर  समेटता है बिखरे ब्‍लॉक्‍स  
और बार -बार रचता है कुछ नया 
सिर्फ इसी उम्‍मीद में कि
शायद अगली बार
उसकी कोशिश मुकम्‍मल होगी।

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

होममेकर

बेतरतीब मकान को
बडे जतन से संवार कर
उसे घर बनाती है वह
... और ढूंढ रही होती है
कोई ऐसा कोना
जहां घडी-दो घडी
बैठकर खुद से  करे
ढेर सारी अनकही बातें
जिसकी दीवारें बन जाएं कैनवस
और वह उन पर चस्‍पां कर दे
उम्‍मीदों से भरा एक कोलाज
सदियों से उसकी यह तलाश जारी है
पर वह अब तक
ढूंढ न पाई
कोई एेसा कोना
जहां वह जी ले
कुछ पल अपने साथ
....सिर्फ अपने लिए।

सपने

रेशमी अहसासों के बारीक धागो से
सपनों की ओढनी बुनती लडकी
डरती है कि 
कहीं चटक कर टूट न जाए कोई धागा 
फिर  भी वह बुनना नहीं छोडती 
क्‍योंकि ...
समय के साथ 
सयानी होती लडकी 
समझने लगी है 
अपने सपनों की कीमत।